अंधे बने रहे तो सभी दीदा-वर मिले

आँखें खुलीं तो दहर में अंधे नगर मिले

​तूफ़ान से लड़े थे अकेले ही उम्र भर
साहिल पे आ गए तो हमें हम-सफ़र मिले

​बदला मिज़ाज-ए-वक़्त तो रिश्ते बदल गए
मौसम बदल गया तो नए बाल-ओ-पर मिले

​था सोज़-ए-दिल उरूज़ पे बरहम था बख़्त भी
अच्छा हुआ कि राह में तुम मुख़्तसर मिले

​पैदा हुआ है कौन यहाँ अपनी चाह से
मिट्टी को क्यों गिला हो जो मिट्टी का घर मिले

​वक़्त-ए-रवाँ के पास नहीं मोहलत-ए-सुकूँ
ज़र्रे को आरज़ू है कि शम्स-ओ-क़मर मिले

​'सामी' जिए तो अपनी ही मौज-ए-नुमू में हम
एहसान-ए-नाख़ुदा न हमें उम्र भर मिले

— Ehtisham Saami

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