चौधवाँ उस चंदर का साल हुआ

हुस्न में बद्र बा-कमाल हुआ

तुझ सा चंचल नहीं ज़माने में
रम में ऐ मन हिरन ग़ज़ाल हुआ

बाग़-ए-दिल में तू नख़्ल-ए-तूबा है
सर्व तुझ क़द से पाएमाल हुआ

रात दिन तू रहे रक़ीबाँ-संग
देखना तेरा मुझ मुहाल हुआ

देख कर तुझ नयन की शोख़ी कूँ
थक के सहरा-नशीं ग़ज़ाल हुआ

मुर्ग़-ए-दिल के फँसाने को मेरे
दाना-ओ-दाम ज़ुल्फ़ ओ ख़ाल हुआ

ज़ुल्फ़ की हर शिकन में तुझ मेरा
दिल गिरफ़्तार बाल बाल हुआ

— Faez Dehlvi

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