इंसान को ही अक़्ल ये आना तो है नहीं
धरती के ही अलावा ठिकाना तो है नहीं
किस मुँह से हवा माँगते हो काइनात से
जब जंगलों को तुम को बचाना तो है नहीं
भर लो सिलेंडरों में जहाँ भर की ऑक्सीजन
तुम को मगर दरख़्त लगाना तो है नहीं
इंसान को क्या ये लगा वो हो चुका ख़ुदा
इस बे-हया को ज़ात से जाना तो है नहीं
बरसे ना क्यूँ अज़ाब बशर ही पे है ख़बर
क़ुदरत से बस इसे ही निभाना तो है नहीं
मालिक नहीं है बावरे रखना ही क्यूँ अकड़
मेहमान है पर आपने माना तो है नहीं
अब काम धाम धंधे शगल है तेरे बशर
क़ुदरत को आपसे जी कमाना तो है नहीं
— Gagan Bajad 'Aafat'















