pareshaani kabhi apni ya begaani se mar jaayen | परेशानी कभी अपनी या बेगानी से मर जाएँ

  - Gagan Bajad 'Aafat'

परेशानी कभी अपनी या बेगानी से मर जाएँ
उसे है चाह के हम लोग आसानी से मर जाएँ

तुझी को मात दूँ तो हाल मेरा उस ग़ज़ल सा हो
उला जिसका सही मिसरा ग़लत सानी से मर जाएँ

कहाँ हम सेे गया क़ुर्बानियाँ जन्नत दिलाती हैं
तभी हमने कहाँ ये आप क़ुर्बानी से मर जाएँ

मैं जैसे रब से मिलता हूँ मैं वैसे सब से मिलता हूँ
मेरी ख़्वाहिश है के सब लोग हैरानी से मर जाएँ

अगर जो 'इश्क़ में हो तुम सलीके से मिलो हम सेे
न हो ऐसा कि तेरी तल्ख़ बे-ध्यानी से मर जाएँ

सभी को हुस्न के दम पर मुतासिर करने वाले सुन
कहीं ऐसा न हो सब मेहरबानी से मर जाएँ

बड़ा नादान है तू जो ख़ुदा नादान का भी है
भला इस
में ही है तेरा तू नादानी से मर जाएँ

ख़ुदा ने जो भला रक्खा बुरे के भेस में रक्खा
तमाशा तय रहा दुनिया ये मनमानी से मर जाएँ

जहाँ भर में ख़ुदा को ढूँढना जो के ख़ुदी में है
कि हर प्यासा यहाँ पानी की निगरानी से मर जाएँ

मुझे कुछ भी नया लगता नहीं है ये भी आफ़त है
बिमारी तुम नई दोगे के पुरानी से मर जाएँ

  - Gagan Bajad 'Aafat'

Husn Shayari

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