khulii aankhoñ se sapne dekhte hain | खुली आँखों से सपने देखते हैं

  - Gagan Bajad 'Aafat'

खुली आँखों से सपने देखते हैं
हक़ीक़त में वहम को घोलते हैं

हमारे झूठ की क़ीमत बहुत है
न जाने किस लिए सच बोलते हैं

मोहब्बत से हमें इनकार कब है
मगर वो सैलरी भी पूछते हैं

हमारे कल से भी घबरा रहे हैं
हमारा रास्ता भी रोकते है

किसी मिसरे से हमको छेड़ कर के
ग़ज़ल सो जाती है हम जागते हैं

शराफ़त उन पे अब भी सज रही है
अजी वो खेल अच्छा खेलते हैं

तुझे दिन-रात रो कर क्या मिलेगा
न पूछो शे'र कैसे सूझते हैं

बड़े है ख़ौफ़ में ये मेरे कदस
वही काग़ज़ से जो कद नापते हैं

तमन्नाओं की कीमत गिर पड़ी है
नुमाइश है बदन अब जानते हैं

न होना 'इश्क़ में कितना भला है
चलो होने के खतरे देखते है

भला होना हक़ीक़त में बुरा है
फ़क़त इतना बुरा हम मानते हैं

किसी के पैर की बेड़ी रहे थे
वही अब आगे पीछे डोलते हैं

  - Gagan Bajad 'Aafat'

Kamar Shayari

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