ज़िक्र तुम ने किया मगर फिर भी
हो रहा क्यूँ नहीं असर फिर भी
तोड़ के रख दिया मुझे जिस ने
लग रहा है मुझे क़मर फिर भी
खाई थी क़स
में अब न देखेंगे
आ रहा है वहीं नज़र फिर भी
थक गए मुझ को तुम मिटाने में
हो रहा है गुज़र-बसर फिर भी
ज़िंदगी क्यूँ तुझे शिकायत है
दे दिया ख़ून-ए-दिल जिगर फिर भी
"एक शाइ'र" ग़ज़ल सुनाता है
बहरस दूर है डगर फिर भी
— gaurav saklani















