उस सेे कहना कि चला आए सँभाले मुझ को
इस से पहले कि अजल आ के उठा ले मुझ को
मैं वो पौधा हूँ जिसे तू ने हरा रक्खा था
आज मैं सूख रहा हूँ तो बचा ले मुझ को
दिल तो कहता है अंधेरे में बसा लूँ दुनिया
वरना अब नोच ही खाएंगे उजाले मुझ को
ये बदन ख़ाक हुआ रूह मगर बाक़ी है
अब भी ज़िंदा हूँ तो आ और सता ले मुझ को
गर वही होता है 'सरवर' जो लिखा होता है
फिर तो मंज़ूर मिरे पाँव के छाले मुझ को
— Hameed Sarwar Bahraichi















