अब के मिलना भी हमारा न हुआ
दर्द इतना था किनारा न हुआ
छोड़ कर तुम जो गए राहों में
फिर कभी घर का नज़ारा न हुआ
ख़त तिरे दिल में रखे हैं अब भी
फिर कोई और सहारा न हुआ
मैं ने चाहा तुझे भूलूँ लेकिन
दिल को ये बोझ गवारा न हुआ
तेरी तस्वीर भी बे-रंग लगी
चाँद भी पहले सा प्यारा न हुआ
— REHAN KHAN















