“तेरे शहर नहीं आऊँगा ”

ख़ुशियों के पलों से कहीं ज़ियादा
मुझे इसने ग़म दिए हैं
ता-'उम्र न भर पाएँगे तेरे शहर ने
कुछ ऐसे ज़ख़्म दिए हैं
आकार जहाँ सुकून सा मिलता था
वहीं मेरा दम घुटा है
यहीं आ कर जीती थी दुनिया,
यहीं मेरा सब कुछ लुटा है

वो आख़िरी मर्तबा मेरे साथ क्या क्या हुआ
कभी न भुलाऊँगा
सुनो मैं अब कभी तेरे शहर नहीं आऊँगा

कोई दर नहीं छोड़ा जहाँ तुझे मैं ने माँगा न हो
ऐ ख़ुदा इस जहान में मुझ-सा कोई अभागा न हो
जब इल्म हुआ कि तू अब किसी और की अमानत है
मेरा इश्क़ तो जैसे वहीं हार गया
जिस के वास्ते जी रहा था मैं
अफ़सोस वही शख़्स मुझे मार गया

ख़ुद को कैसे तसल्ली दिलाऊँ,
अब किसे अपना हाल-ए-दिल बताऊँगा
सुनो मैं अब कभी तेरे शहर नहीं आऊँगा

— Harsh saxena

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