मेरे दरवाज़े पे ख़ुशियाँ रास्ता तकती रही

और हम कमरे से तेरी खिड़कियां तकते रहे

जिन से अपना राब्ता था वो हमारे न हुए
और उन लोगों के हक़ में हम दुआ पढ़ते रहे

इक नदी से ली नमी औ' पेड़ से ली शोखियाँ
फिर तुम्हारी याद में हम आँख नम करते रहे

पहले हम ने ग़म लिए फिर मोल ली ग़म की वज़ह
फिर तिरी यादों से अपने ग़म को हम भरते रहे

रोज़ जागे दिन निकाला शाम को रोके रहे
जाने कैसे रात भर हम हर घड़ी मरते रहे

वैसे हम ने सब लुटाया जो कमाया था कभी
इक तिरे जाने के डर से कितना हम डरते रहे

हम ने नींदों को सुलाया रोज़ गा के मर्सिया
कब्र में अपनी मगर हम रात भर जगते रहे

— Himanshu Kiran Sharma

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