मेरे दरवाज़े पे खुशियाँ रास्ता तकती रही
और हम कमरे से तेरी खिड़कियां तकते रहे
जिनसे अपना राब्ता था वो हमारे न हुए
और उन लोगों के हक़ में हम दुआ पढ़ते रहे
इक नदी से ली नमी औ' पेड़ से ली शोखियाँ
फिर तुम्हारी याद में हम आँख नम करते रहे
पहले हमने गम लिए फिर मोल ली गम की वज़ह
फिर तिरी यादों से अपने गम को हम भरते रहे
रोज़ जागे दिन निकाला शाम को रोके रहे
जाने कैसे रात भर हम हर घड़ी मरते रहे
वैसे हमने सब लुटाया जो कमाया था कभी
इक तिरे जाने के डर से कितना हम डरते रहे
हमने नींदों को सुलाया रोज़ गा के मर्सिया
कब्र में अपनी मगर हम रात भर जगते रहे
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