मैं वाक़िफ़ हूँ ज़माने भर की फ़ितरत से
इन्हें सदियों से नफ़रत है मुहब्बत से
ये मेरा हर जगह नुक़सान करती है
शिकायत है मुझे अपनी शराफ़त से
बहुत दिन दूर मुझ से रह नहीं सकती
मिरा रिश्ता बहुत गहरा है शोहरत से
उन्हें क़ुदरत क़यामत तक रुलाएगी
जो खेलेंगे ग़रीब इंसाँ की इज़्ज़त से
किसी की बे-वफ़ाई याद आती है
मुझे जब देखता है कोई चाहत से
कई ग़म हैं मगर ये सोच कर ख़ुश हूँ
जिसे मिलता है जो मिलता है क़िस्मत से
सुनो 'सागर' यही बस साथ देती है
ज़रा सा इश्क़ कर लो तुम भी दौलत से
— SAAGAR SINGH RAJPUT















