यही तो शम्स लगती हैं यही महताब की आँखें
यक़ीनन ख़ूब-सूरत हैं यहाँ हर ख़्वाब की आँखें
बदन है फूल के जैसे नज़र शमशीर के माफ़िक
उठे तो जान ही ले लें इधर अहबाब की आँखें
पड़ा सूखा हुआ है और दुनिया रेत का मंज़र
बरसते हैं वहाँ बादल जहाँ हैं आब की आँखें
पलट कर के जिसे देखे उसे आग़ोश में ले ले
सियासत ख़ूब करती है यहाँ अहज़ाब की आँखें
कि मेरा दिल नहीं लगता बिना उस के कहीं इक पल
करिश्मा कर चुकी शायद नज़र से ताब की आँखें
— Inshpa Ilahabadi















