इस तरफ़ से दीदा-ए-तर और है
दूसरी जानिब समुंदर और है
इन दिनों शादाब है ये दिल मगर
इस ख़राबे का मुक़द्दर और है
दश्त से गुज़रा तो दरिया पर खुला
कोई दरिया से भी बढ़ कर और है
चल ज़रा उस को भी जा कर देख आए
इक शजर उस रहगुज़र पर और है
ये बिछड़ने का समाँ सब कुछ नहीं
इस से आगे एक मंज़र और है
दिल से याद-ए-यार जाती है तो क्या
एक घर इस घर से बाहर और है
इक सफ़र सहरा से घर तक है 'जमाल'
इक मसाफ़त घर के अंदर और है
— Jamal Ehsani















