nahin dekhi hai shakal tak uski | नहीं देखी है शकल तक उसकी

  - Jaun Elia

नहीं देखी है शकल तक उसकी
ख़्वाब में किसकी शकल देखूँ मैं

  - Jaun Elia

Fantasy Shayari

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    सर ही अब फोड़िए नदामत में
    नींद आने लगी है फ़ुर्क़त में

    हैं दलीलें तिरे ख़िलाफ़ मगर
    सोचता हूँ तिरी हिमायत में

    रूह ने इश्क़ का फ़रेब दिया
    जिस्म को जिस्म की अदावत में

    अब फ़क़त आदतों की वर्ज़िश है
    रूह शामिल नहीं शिकायत में

    इश्क़ को दरमियाँ न लाओ कि मैं
    चीख़ता हूँ बदन की उसरत में

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    रूठते अब भी हैं मुरव्वत में

    वो जो ता'मीर होने वाली थी
    लग गई आग उस इमारत में

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    दिल नहीं लग रहा मोहब्बत में

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    यही मुमकिन था इतनी उजलत में

    फिर बनाया ख़ुदा ने आदम को
    अपनी सूरत पे ऐसी सूरत में

    और फिर आदमी ने ग़ौर किया
    छिपकिली की लतीफ़ सनअ'त में

    ऐ ख़ुदा जो कहीं नहीं मौजूद
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    Jaun Elia
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    अपने सब यार काम कर रहे हैं
    और हम हैं कि नाम कर रहे हैं

    तेग़-बाज़ी का शौक़ अपनी जगह
    आप तो क़त्ल-ए-आम कर रहे हैं

    दाद-ओ-तहसीन का ये शोर है क्यूँ
    हम तो ख़ुद से कलाम कर रहे हैं

    हम हैं मसरूफ़-ए-इंतिज़ाम मगर
    जाने क्या इंतिज़ाम कर रहे हैं

    है वो बेचारगी का हाल कि हम
    हर किसी को सलाम कर रहे हैं

    एक क़त्ताला चाहिए हम को
    हम ये एलान-ए-आम कर रहे हैं

    हम तो आए थे अर्ज़-ए-मतलब को
    और वो एहतिराम कर रहे हैं

    न उठे आह का धुआँ भी कि वो
    कू-ए-दिल में ख़िराम कर रहे हैं

    उस के होंटों पे रख के होंट अपने
    बात ही हम तमाम कर रहे हैं

    हम अजब हैं कि उस के कूचे में
    बे-सबब धूम-धाम कर रहे हैं
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    Jaun Elia
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    अपनी मंज़िल का रास्ता भेजो
    जान हम को वहाँ बुला भेजो

    क्या हमारा नहीं रहा सावन
    ज़ुल्फ़ याँ भी कोई घटा भेजो

    नई कलियाँ जो अब खिली हैं वहाँ
    उन की ख़ुश्बू को इक ज़रा भेजो

    हम न जीते हैं और न मरते हैं
    दर्द भेजो न तुम दवा भेजो

    धूल उड़ती है जो उस आँगन में
    उस को भेजो सबा सबा भेजो

    ऐ फकीरो गली के उस गुल की
    तुम हमें अपनी ख़ाक-ए-पा भेजो

    शफ़क़-ए-शाम-ए-हिज्र के हाथों
    अपनी उतरी हुई क़बा भेजो

    कुछ तो रिश्ता है तुम से कम-बख़्तों
    कुछ नहीं कोई बद-दुआ' भेजो
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    Jaun Elia
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    Jaun Elia
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    Jaun Elia

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