ज़रा सी बात को दिल से लगाए बैठी है
मनाऊॅं कैसे उसे तमतमाए बैठी है
सुना है जब से उसे भी है शायरी से शगफ़
तभी से दिल में वो मेरे समाए बैठी है
कहा था मैं ने कि घर आ के चाँद देखूँगा
झुका के सर को वो बिस्तर पे हाए बैठी है
ज़रा सी देर हुई है मुझे घर आने में
ख़फ़ा है मुझ से वो और मुँह घुमाए बैठी है
उसे पता ही नहीं है वो ख़ुद है माह-जबीं
सियाह रात में बत्ती जलाए बैठी है
— 'June' Sahab Barelvi















