मज्मा लगा हुआ है सुना ख़ूब रंग-ओ-रस
ख़्वाहिश है रेख़्ता में पढूँ मैं भी इस बरस
हो जाऊँ मैं शराब-ज़दा इस क़दर कभी
तू मिन्नतों से जाम दे और मैं कहूँ कि बस
ऐसे वो देखता है उसे सर से पा तलक
जैसे निगाह में हो भरी जिस्म की हवस
जब से दिखे रक़ीब मुझे तेरे आस-पास
तब से ये दिल है ख़ौफ़ज़दा मेरे हम-नफ़स
गर इश्क़ हो गया है तुझे कह दे बे-झिझक
रखना तू इश्क़ में न कभी कोई पेश-ओ-पस
— 'June' Sahab Barelvi















