जिस्म
मैं अपनी हैसियत जानता हूँ यारों
वो हसीन लड़की मेरी दस्तरस में नहीं है
मैं तो उसे पूरा पाना चाहता हूँ या'नी
सिर्फ़ जिस्म ही मेरी हवस में नहीं है
मेरा जिस्म तो तख्ता-दार पर लटका हुआ है
उधर दूर से देखता हुआ मेरा मक़ाम है
हुज्जत नफ़रत शिकायत हैरत ही बची है अब
उस से करने को ख़त-ओ-किताबत ही बची है अब
— 'June' Sahab Barelvi















