allah ye kis ka maatam hai vo zulf jo bikhri jaati hai | अल्लाह ये किस का मातम है वो ज़ुल्फ़ जो बिखरी जाती है

  - Kaif Bhopali

अल्लाह ये किस का मातम है वो ज़ुल्फ़ जो बिखरी जाती है
आँखें है कि भीगी जाती हैं दुनिया है कि डूबी जाती है

कुछ बीते दिनों की यादें हैं और चारों तरफ़ तन्हाई सी
मेहमाँ हैं कि आए जाते हैं महफ़िल है कि उजड़ी जाती है

तदबीर के हाथों कुछ न हुआ तक़दीर की मुश्किल हल न हुई
नाख़ुन हैं कि टूटे जाते हैं गुत्थी है कि उलझी जाती है

क्या कोई मोहब्बत में यूँँ भी बेनाम-ओ-निशाँ हो जाता है
मैं हूँ कि अभी तक ज़िंदा हूँ दुनिया है कि भूली जाती है

  - Kaif Bhopali

Zulf Shayari

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