तेरे लब चूमने हैं और सजदे सर झुकाना है
मुझे ख़ुद जीतना है और तुझ से हार जाना है
अभी रुक जा अभी है शा'इरी का दौर महफ़िल में
अकेले में तुझे अपना कोई दुखड़ा सुनाना है
यक़ीनन हम नहीं क़ाबिल मोहब्बत के तेरी हमदम
मगर इस बात पे क्या रोज़ ही नीचा दिखाना है
सियासी चाल मत चलना ये खाती है तअल्लुक़ को
सियासत की गली हर रोज़ मेरा आना जाना है
जलाती जा रही है अब मेरी ही रौशनी मुझ को
मुझे अब तीरगी करनी है ये दीया बुझाना है
दवा की ज़िद मेरी साँसें किसी भी हाल टूटे अब
दुआ की ज़िद मुझे हर हाल में ज़िंदा बचाना है
— SAMEER TYAGI















