आना-जाना रोज़ लगाए रखता है
एक जगह पर कब वो बादल बरसा है
कहते हो शब ही क्यूँ गिर्द भटकते हो
तुमने दिन में कौन सा जुगनू देखा है
एक इमरोज़ तो पहले से ही हासिल था
उस लड़की ने साहिर बाद में ढूँढा है
अपने अपनों से अपना इक चुनना था
सो अपनी शर्तों पे अपना खोया है
तुम भी अपनी बात सुनाकर जाते हो
ख़ैर किसी ने कब ही मेरा पूछा है
कीर्ति कैसे जान बचे इस ज़ालिम से
ख़ुद ही घाव लगाकर ख़ुद ही रोता है
Our suggestion based on your choice
As you were reading Shayari by Shayra kirti
our suggestion based on Shayra kirti
As you were reading Zakhm Shayari Shayari