थोड़ा सा इसरार करें तो इतनी मोहब्बत मिल जाती है
अब भी उस को देखने और छूने की इजाज़त मिल जाती है
दस सालों से पड़े हुए हैं हम बेहाल तेरे दिल में
इतने में तो ग़ैर-मुमालिक की शहरियत मिल जाती है
इश्क़ अगर हम सेाए में हो जाए तो ये फ़ाइदा है
दिल से दिल मिल जाता है और छत से छत मिल जाती है
— Khurram Afaq















