तिरी जब आशिक़ी हम देखते हैं
फिर अपनी ज़िन्दगी हम देखते हैं
उजाला देखती हैं आँखें उस की
फ़क़त ये तीरगी हम देखते हैं
जहाँ बाजों को दुनिया देखती है
वहीं वो दस्तगी हम देखते हैं
ये अपना ग़म नहीं फिर याद रहता
किसी की जब ख़ुशी हम देखते हैं
बदन जिस का ज़माना देखता है
उसी की सादगी हम देखते हैं
बिछड़ने पे कभी हैरान भी थे
अभी बस बे-दिली हम देखते हैं
— Kush Pandey ' Saarang '















