दिल-कशी भी दस्तरस में और होती
आरज़ू दिल की न बस में और होती
जब दिल-ए-बे-मुद्दआ भी और ही हो
बात दिल की हम-नफ़स में और होती
हर कोई आगे ही बढ़ना चाहता है
जुस्तुजू भी फिर हवस में और होती
इस तरह ही मौसमी बारिश अगर हो
फ़स्ल भी अब के बरस में और होती
मुस्कुराहट से अगर जब आग लगती
तिश्नगी भी ख़ूब नस में और होती
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