बात करते हैं अब मुहब्बत की
खोद दें क़ब्र चल कुदूरत की
साथ जीना यहीं पे मरना यहीं
बुग़्ज़ फिर दिल में क्यूँ रक़ाबत की
क़द्र इंसाँ की कौन करता है
क़द्र होती है माल-ओ-दौलत की
दौर है शोबदा नुमाइश का
ज़िंदगी खो गई हक़ीक़त की
नाम मेरा न हो किसी लब पर
जब कहीं बात हो नदामत की
मुड़ के मत देख जो हुआ सो हुआ
लिख दे तारीख़ अब सख़ावत की
प्यार भी उस को ही मिला है 'उमर'
जिस ने इज़हार की जसारत की
— Mohiuddin Qamaruddin Ansari















