डूबी हुई है सारी ख़ुदाई सियाह में
दुनिया बदल गई है किसी रज़्म-गाह में
बे-लौस एक काम भी करता नहीं कोई
करता है नेकियाँ भी तो जन्नत की चाह में
हासिल अगर हुआ न हो कुछ भी फ़ितूर से
तो ज़िंदगी गुज़ार दे अब नेक-ख़्वाह में
बनते हैं जोड़े ख़ुल्द में तो टूटते हैं क्यूँ
शामिल है क्यूँ तलाक़ का फ़ित्ना निकाह में
हक़ मारने में कोई भी पीछे नहीं है आज
सय्याद बन के बैठे हैं सारे ही राह में
ये सोच कर चले हैं ज़माने को छोड़ कर
शायद मिले सुकून ख़ुदा की पनाह में
उम्मीद एक पल को भी छोड़ी नहीं 'उमर'
बदलेगी मेरी रात कभी तो पगाह में
— Mohiuddin Qamaruddin Ansari














