इतरा न ज़िंदगी पे छलावा है ज़िंदगी
इक ख़ुश-नुमा बहार का झोंका है ज़िंदगी
ये दिल-कशी ये रौनक़ें ये रंग ये सुरूर
सब हैं फ़रेब मौत का साया है ज़िंदगी
तन्हा हर एक शख़्स है लाखों की भीड़ में
तो क्या बराए नाम का मेला है ज़िंदगी
माँगी पनाह उस ने ही अपने हबीब से
जिस ने भी तुझ को पास से देखा है ज़िंदगी
कोई कहे सराब तो कोई कहे तिलिस्म
अब तू ही ये बता दे कि तू क्या है ज़िंदगी
किरदार हर किसी का है पहले से तय-शुदा
शतरंज काइनात है मोहरा है ज़िंदगी
मौज़ू-ए-जुस्तुजू रही रोज़-ए-अजल से ही
जो हल न हो सका वो मुअम्मा है ज़िंदगी
— Mohiuddin Qamaruddin Ansari















