ख़ुद को ही दे कर तसल्ली ख़ुद को ही छलते रहे
वैसे तो बर्बादियों के दौर ही चलते रहे
हम को इक ज़रिया बना कर बढ़ गए आगे सभी
हम खड़े अपनी जगह बस हाथ ही मलते रहे
बद-नसीबी थी हमारी या गुनाहों की सज़ा
जो जफ़ा करते रहे दिल में वही पलते रहे
दर्द किस से बाँटते हम कौन था अपना यहाँ
ग़ैर को हम क्या कहें अपनों को भी खलते रहे
और कुछ करने की मोहलत ज़िंदगी ने दी नहीं
ज़ख़्म ही इतने थे उन को ही हवा झलते रहे
देख कितने ख़्वाब इन आँखों में बसते थे कभी
ये अलग है आँसुओं में सब के सब ढलते रहे
वस्ल का अरमान ले कर घर से निकले थे मगर
ज़िंदगी भर हिज्र के अंगार में जलते रहे
— Mohiuddin Qamaruddin Ansari















