कुछ न कुछ तो मुग़ालता है मुझे
तब ही सब रास आ रहा है मुझे
तुझ को तेरी अना ही ले डूबी
हर किसी ने यही कहा है मुझे
सर उठाने लगीं तमन्नाएँ
उफ़ न जाने ये क्या हुआ है मुझे
ज़ोम इस बात का भी था मुझ को
कोई ख़ुश-दिल से चाहता है मुझे
दर्द मुद्दत से है शरीक-ए-सफ़र
अब इसी का ही आसरा है मुझे
कोई मिस्कीन का नहीं होता
तजरबा इस का हो गया है मुझे
चोट उस से ही पाई मैं ने 'उमर'
नाज़ जिस जिस पे भी रहा है मुझे
— Mohiuddin Qamaruddin Ansari















