मक्र-ओ-फ़रेब झूट से ना-आश्ना हूँ मैं
नाकाम इसी वजह से ही शायद रहा हूँ मैं
दुनिया तो जा के चाँद पे वापस भी आ गई
पर आज भी ज़मीन पे बैठा हुआ हूँ मैं
ज़िद थी कि मैं चलूँगा तो बस नेक राह पर
अंजाम ये रहा है कि बे-क़ाफ़िला हूँ मैं
सर पे जवाब-दारी थी कितनी न पूछिए
हैरान हूँ कि पाँव पे अब भी खड़ा हूँ मैं
ठोकर भी ख़ूब खाई मुहब्बत की राह में
अब लोग भी ये कहने लगे दिल-जला हूँ मैं
तक़दीर इस ग़रीब से नाराज़ क्या हुई
सब दूर ऐसे हो गए जैसे वबा हूँ मैं
हर ज़र्ब ज़िंदगी का 'उमर' ज़ब्त कर गया
उफ़ जाने कैसी ख़ाक से देखो बना हूँ मैं
— Mohiuddin Qamaruddin Ansari














