नाज़ जिन पे था हम-नवाई का
दे गए दर्द बे-वफ़ाई का
अब मेरे दिल को कोई काम नहीं
फ़िक्र-ए-वासिल न ग़म जुदाई का
जब सँभलता नहीं जहाँ तुझ से
फ़ाइदा क्या है फिर ख़ुदाई का
चल दिए फेर कर नज़र वो सब
जिन से नाता था आशनाई का
दर्द मिस्कीन का न बाँटे कोई
अब ज़माना कहाँ भलाई का
अब न तहज़ीब ही बची न ख़ुलूस
दौर आया है बे-हयाई का
चैन हासिल कहीं हुआ न 'उमर'
ये नतीजा रहा बुराई का
— Mohiuddin Qamaruddin Ansari















