संग-दिल इतनी ज़िंदगी क्यूँ है
मुश्किलों से भरी पड़ी क्यूँ है
चैन ढूँढे़ से भी नहीं मिलता
जिस को देखो वही दुखी क्यूँ है
मुख़्तसर भी है और फ़ानी भी
ज़िंदगी हम को फिर मिली क्यूँ है
सरहदों में बँटी है क्यूँ दुनिया
क़ौम के नाम सरकशी क्यूँ है
ज़िंदगी नाम है सफ़र का जब
राह काँटों से ही भरी क्यूँ है
मस्त अपने में हर कोई है यहाँ
सब की आँखों में बे-हिसी क्यूँ है
क़द्र मख़्लूक़ की नहीं तो फिर
उस के ख़ालिक़ की बंदगी क्यूँ है
अम्न ही जब नहीं जहाँ में 'उमर'
ये ज़मीं आज भी टिकी क्यूँ है
— Mohiuddin Qamaruddin Ansari














