तन्हाइयों को अब भी तेरा साथ याद है
फ़ुर्क़त के साथ वस्ल की हर रात याद है
आबाद तेरे दम से ही थी ज़िंदगी मेरी
बर्बादियों में भी था तेरा हाथ याद है
गुज़रा है इक हसीन ज़माना भी तेरे साथ
जब हर क़दम पे था तेरा ही साथ याद है
काँटों पे कट रहे थे मेरे दिन फ़िराक़ के
अश्कों में ढल रही थी हर इक रात याद है
जब ख़त्म कर के सारे तअल्लुक़ गए थे तुम
उस बद-नसीब रात की हर बात याद है
तुझ से मिले जो ज़ख़्म वो ताज़े हैं आज भी
तुझ से ही इश्क़ में मिली थी मात याद है
अब रह गया है दर्द ही दिल के मक़ाम पे
तुम से 'उमर' ने पाई ये सौग़ात याद है
— Mohiuddin Qamaruddin Ansari














