ज़ीस्त अब मुस्कुराने वाली है
मौत लगता है आने वाली है
मेरी दुनिया उजाड़ कर के तू
किस की दुनिया बसाने वाली है
इश्क़ क्या उस को कुछ नहीं आता
बस वो बातें बनाने वाली है
बच के रहना कि हाँ वही लड़की
का'बा-ए-दिल को ढाने वाली है
फिर से वो बन सँवर के निकली है
फिर क़यामत उठाने वाली है
किस को होगा नसीब तेरा बदन
किस को दुनिया घुमाने वाली है
क़ैस की तरह आज कल 'क़ैसर'
अपनी हालत दिवाने वाली है
— Meem Maroof Ashraf















