मय-ख़्वार को शराब ही रोज़ाना चाहिए
नज़दीक घर के अपने ही मयख़ाना चाहिए
ग़म दफ़्न हो जहाँ वही तह-ख़ाना चाहिए
अंदाज़ हम को अपना फ़कीराना चाहिए
अनजाना चाहिए न तो बेगाना चाहिए
मर जाए शम्अ' पे जो वो परवाना चाहिए
महफ़ूज रह सके जहाँ में अपनी बेटियाँ
मज़बूत हम को ऐसा ही काशाना चाहिए
तस्वीर मेरी दिल में बसा के रखे जो रोज़
इस दिल जिगर को ऐसा ही दीवाना चाहिए
हम जश्न तो मना चुके हैं अपनी जीत का
अब उन के ज़ख़्मों को हमें सहलाना चाहिए
होते हैं ज़ुल्म रोज़ ही मज़लूमों पर ख़ुदा
हम को न कोई ऐसा सियहखाना चाहिए
'मीना' सुकून दिल को भी थोड़ा तो अब मिले
ग़ज़लों से दिल को अब हमें बहलाना चाहिए
— Meena Bhatt















