वो भला आँख के जालों को कहाँ देखेगा
कोई इन दर्द के नालों को कहाँ देखेगा
रोज़ इल्ज़ाम लगाएगा ज़माना फिर भी
वो ग़रीबों के निवालों को कहाँ देखेगा
मर मिटेगा तेरी इन शोख़ अदाओं पर दिल
वो ज़माने के सवालों को कहाँ देखेगा
मयकशी की जिसे आदत पड़ी है देखो वो
इन गुलाबी तेरे गालों को कहाँ देखेगा
कोई मुख़्तार न होगा यहाँ इन साँसों का
इस सियासत की भी चालों को कहाँ देखेगा
रोज़ बदलेगी ये रुत देखना बारूदों से
कोई चुभते हुए भालों को कहाँ देखेगा
जिस की क़िस्मत में लिखी तीरगी ही 'मीना' बस
वो भला दिन के उजालों को कहाँ देखेगा
— Meena Bhatt















