ham aap hi ko apna maqsood jaante hain | हम आप ही को अपना मक़्सूद जानते हैं

  - Meer Taqi Meer

हम आप ही को अपना मक़्सूद जानते हैं
अपने सिवाए किस को मौजूद जानते हैं

इज्ज़-ओ-नियाज़ अपना अपनी तरफ़ है सारा
इस मुश्त-ए-ख़ाक को हम मस्जूद जानते हैं

सूरत-पज़ीर हम बिन हरगिज़ नहीं वे माने
अहल-ए-नज़र हमीं को मा'बूद जानते हैं

इश्क़ उन की अक़्ल को है जो मा-सिवा हमारे
नाचीज़ जानते हैं ना-बूद जानते हैं

अपनी ही सैर करने हम जल्वा-गर हुए थे
इस रम्ज़ को व-लेकिन मादूद जानते हैं

यारब कसे है नाक़ा हर ग़ुंचा इस चमन का
राह-ए-वफ़ा को हम तो मसदूद जानते हैं

ये ज़ुल्म-ए-बे-निहायत दुश्वार-तर कि ख़ूबाँ
बद-वज़इयों को अपनी महमूद जानते हैं

क्या जाने दाब सोहबत अज़ ख़्वेश रफ़्तगाँ का
मज्लिस में शैख़-साहिब कुछ कूद जानते हैं

मर कर भी हाथ आवे तो 'मीर' मुफ़्त है वो
जी के ज़ियान को भी हम सूद जानते हैं

  - Meer Taqi Meer

Valentine Shayari

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    फ़िक्र है माह के जो शहर-बदर करने की
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    कह हदीस आने की उस के जो किया शादी मर्ग
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    Meer Taqi Meer
    यार ने हम से बे-अदाई की
    वस्ल की रात में लड़ाई की

    बाल-ओ-पर भी गए बहार के साथ
    अब तवक़्क़ो नहीं रिहाई की

    कुल्फ़त-ए-रंज-ए-इश्क़ कम न हुई
    मैं दवा की बहुत शिफ़ाई की

    तुर्फ़ा रफ़्तार के हैं रफ़्ता सब
    धूम है उस की रहगिराई की

    ख़ंदा-ए-यार से तरफ़ हो कर
    बर्क़ ने अपनी जग-हँसाई की

    कुछ मुरव्वत न थी उन आँखों में
    देख कर क्या ये आश्नाई की

    वस्ल के दिन को कार-ए-जाँ न खिंचा
    शब न आख़िर हुई जुदाई की

    मुँह लगाया न दुख़्तर-ए-रज़ को
    मैं जवानी में पारसाई की

    जौर उस संग-दिल के सब न खिंचे
    उम्र ने सख़्त बेवफ़ाई की

    कोहकन क्या पहाड़ तोड़ेगा
    इश्क़ ने ज़ोर-आज़माई की

    चुपके उस की गली में फिरते रहे
    देर वाँ हम ने बे-नवाई की

    इक निगह में हज़ार जी मारे
    साहिरी की कि दिलरुबाई की

    निस्बत उस आस्ताँ से कुछ न हुई
    बरसों तक हम ने जब्हा-साई की

    'मीर' की बंदगी में जाँ-बाज़ी
    सैर सी हो गई ख़ुदाई की
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    Meer Taqi Meer
    यकसू कुशादा-रवी पर चीं नहीं जबीं भी
    हम छोड़ी महर उस की काश उस को होवे कीं भी

    आँसू तो तेरे दामन पोंछे है वक़्त गिर्या
    हम ने न रखी मुँह पर ऐ अब्र-ए-आस्तीं भी

    करता नहीं अबस तो पारा गुलो-फ़ुग़ाँ से
    गुज़रे है पार दिल के इक नाला-ए-हज़ीं भी

    हूँ एहतिज़ार में मैं आईना-रू शिताब आ
    जाता है वर्ना ग़ाफ़िल फिर दम तो वापसीं भी

    सीने से तीर उस का जी को तो लेता निकला
    पर साथों साथ उस के निकली इक आफ़रीं भी

    हर शब तिरी गली में आलम की जान जा है
    आगे हवा है अब तक ऐसा सितम कहीं भी

    शोख़ी-ए-जल्वा उस की तस्कीन क्यूँके बख़्शे
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    तकलीफ़-ए-नाला मत कर ऐ दर्द दिल कि होंगे
    रंजीदा राह चलते आज़ुर्दा हम-नशीं भी

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    रुख़्सत तलब है जाँ भी ईमान और दीं भी

    ज़ेर-ए-फ़लक जहाँ टक आसूदा 'मीर' होते
    ऐसा नज़र न आया इक क़ता-ए-ज़मीं भी
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