mar mar ga.e nazar kar us ke barhana tan men | मर मर गए नज़र कर उस के बरहना तन में

  - Meer Taqi Meer

मर मर गए नज़र कर उस के बरहना तन में
कपड़े उतारे उन ने सर खींचे हम कफ़न में

गुल फूल से कब उस बिन लगती हैं अपनी आँखें
लाई बहार हम को ज़ोर-आवरी चमन में

अब लाल-ए-नौ-ख़त उस के कम बख़्शते हैं फ़रहत
क़ुव्वत कहाँ रहे है याक़ूती-ए-कुहन में

यूसुफ़ अज़ीज़-ए-दिला जा मिस्र में हुआ था
पाकीज़ा गौहरों की इज़्ज़त नहीं वतन में

दैर ओ हरम से तू तो टुक गर्म-ए-नाज़ निकला
हंगामा हो रहा है अब शैख़ ओ बरहमन में

आ जाते शहर में तू जैसे कि आँधी आई
क्या वहशतें किया हैं हम ने दिवानपन में

हैं घाव दिल पर अपने तेग़-ए-ज़बाँ से सब की
तब दर्द है हमारे ऐ 'मीर' हर सुख़न में

  - Meer Taqi Meer

Bijli Shayari

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