रात कट जाएगी दिन गुज़र जाएगा
चोट कैसी भी हो ज़ख़्म भर जाएगा
उड़ गया तोड़ कर डोर जो साँसों की
एक दिन वो परिंदा भी मर जाएगा
मान लेता हूँ मेरा नहीं वो मगर
दाग़ दामन पे लेकर किधर जाएगा
ख़ामख़ाँ कर दिया मैं ने ख़ुद को फ़ना
वो किनारे से पहले उतर जाएगा
ज़िंदगी ले रही है अभी इम्तिहाँ
आँख से डर है काजल बिखर जाएगा
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