hawa-e-hijr men jo kuchh tha ab ke KHaak hua | हवा-ए-हिज्र में जो कुछ था अब के ख़ाक हुआ

  - Mohsin Naqvi

हवा-ए-हिज्र में जो कुछ था अब के ख़ाक हुआ
कि पैरहन तो गया था बदन भी चाक हुआ

अब उस से तर्क-ए-तअल्लुक़ करूँँ तो मर जाऊँ
बदन से रूह का इस दर्जा इश्तिराक हुआ

यही कि सब की कमानें हमीं पे टूटी हैं
चलो हिसाब-ए-सफ़-ए-दोस्ताँ तो पाक हुआ

वो बे-सबब यूँँही रूठा है लम्हा-भर के लिए
ये सानेहा न सही फिर भी कर्ब-नाक हुआ

उसी के क़ुर्ब ने तक़्सीम कर दिया आख़िर
वो जिस का हिज्र मुझे वज्ह-ए-इंहिमाक हुआ

शदीद वार न दुश्मन दिलेर था 'मोहसिन'
मैं अपनी बे-ख़बरी से मगर हलाक हुआ

  - Mohsin Naqvi

Dushman Shayari

Our suggestion based on your choice

More by Mohsin Naqvi

As you were reading Shayari by Mohsin Naqvi

Similar Writers

our suggestion based on Mohsin Naqvi

Similar Moods

As you were reading Dushman Shayari Shayari