kathin tanhaaiyon se kaun khela main akela | कठिन तन्हाइयों से कौन खेला मैं अकेला

  - Mohsin Naqvi

कठिन तन्हाइयों से कौन खेला मैं अकेला
भरा अब भी मिरे गाँव का मेला मैं अकेला

बिछड़ कर तुझ से मैं शब भर न सोया कौन रोया
ब-जुज़ मेरे ये दुख भी किस ने झेला मैं अकेला

ये बे-आवाज़ बंजर बन के बासी ये उदासी
ये दहशत का सफ़र जंगल ये बेला मैं अकेला

मैं देखूँ कब तलक मंज़र सुहाने सब पुराने
वही दुनिया वही दिल का झमेला मैं अकेला

वो जिस के ख़ौफ़ से सहरा सिधारे लोग सारे
गुज़रने को है तूफ़ाँ का वो रेला मैं अकेला

  - Mohsin Naqvi

Udas Shayari

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