सुख़नवर ग़म कुशादा कर रहे हैं
पुराने ज़ख़्म ताज़ा कर रहे हैं
कोई समझाए अहल-ए-अक़्ल इनको
ग़मों को क्यूँ लबादा कर रहे हैं
मुहब्बत हो गई आसान शायद
नए लड़के ज़ियादा कर रहे हैं
सफर थम जाएगा मंज़िल मिली तो
चुनाँचे 'इश्क़ आधा कर रहे हैं
उन्हे किस मुँह से मैं कह दूँ सितमगर
वो ये सब हस्ब ए वा'दा कर रहे हैं
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