कोई सुनसान कोना चाहता हूँ
मेरे अल्फ़ाज़ बोना चाहता हूँ
ज़बाँ तकलीफ़ देने लग गई है
मैं अब ख़ामोश होना चाहता हूँ
कभी ग़ुस्सा करूँँ चिल्लाऊँ तुम पर
समझ लेना कि रोना चाहता हूँ
ज़रूरी है सुख़न में इज़्तिराबी
किसी को पा के खोना चाहता हूँ
सबब मौजों में दिलचस्पी है ‘मौजी’
सफ़ीना ख़ुद डुबोना चाहता हूँ
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