मुक्ति
तुम्हें पत्थर की ठोकर लगी
और पत्थर को तुम्हारी
न जाने कितने लोग संभले होंगे
न जाने कितने गिरे होंगे
आगे बढ़ तो सभी गए हैं
पत्थर वहीं रह गया है
बस गया है
अब शायद कोई ठोकर ऐसी लगे जो उखाड़ दे
और मुक्ति मिले।
— Murli Dhakad
तुम्हें पत्थर की ठोकर लगी
और पत्थर को तुम्हारी
न जाने कितने लोग संभले होंगे
न जाने कितने गिरे होंगे
आगे बढ़ तो सभी गए हैं
पत्थर वहीं रह गया है
बस गया है
अब शायद कोई ठोकर ऐसी लगे जो उखाड़ दे
और मुक्ति मिले।
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