न बदला है कुछ भी किसी हाल में
वही हैं मसाइल नए साल में
ज़रा ग़ौर से अब मुझे देखिए
वही एक बन्दा ख़द-ओ-ख़ाल में
कभी तो रिहाई इन्हें भी मिले
जो कब से फँसे हैं किसी जाल में
इन्हें ग़म लगा है गए साल का
जो रोने लगे हैं यूँ सुर-ताल में
नहीं कुछ मिलेगा मिरी ज़ात में
न ज़ाहिद मिलेगा बद-आमाल में
है मेरी कहानी यहीं तक अभी
परिंदा समाया पर-ओ-बाल में
मुहब्बत का कीड़ा भी मर जाएगा
ज़रा ख़ुद को रखिए मिरे हाल में
— nakul kumar















