जो जहाँ भर से दर किनारा हैं
क्यूँँ ग़मों को वो इतना प्यारा हैं
अश्क आँखों से गिर न जाये कहीं
पत्थरों ने हमें पुकारा हैं
ग़म दिए उसने इस मोहब्बत से
दिल कहे मुझ को सब गवारा हैं
आज टूटेगा आसमाँ से जो
वो शब-ए-हिज्र का सितारा हैं
कशमकश सब हमीं पे भारी हैं और
फ़ैसला भी यहाँ हमारा हैं
हम जुदा ख़ुद से अब तलक हैं और
उस को इक ग़ैर का सहारा हैं
दरमियाँ कोई भी गिला न रहा
ये जुदाई का इस्तिआरा हैं
दिल के बाज़ार का हैं हाल बुरा
दिल का होता यहाँ ख़सारा हैं
रौशनाई से लोग अंधे बने
तीरगी का ''अजब नज़ारा हैं
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