साथ लगा जब तो अ़जब ऐश का दहाड़ा।
जिस बाग़ में गेंदों के गए उस को उखाड़ा।
देखी कभी सरसों कभी नरगिस को उजाड़ा।
कहते थे इसी बात को बन, झाड़, पहाड़।
सबकी तो बसन्तें हैं पै यारों का बसन्ता॥
खु़श बैठे हैं सब शाहो वजीर आज अहा हा!।
दिल शाद हैं अदनाओ फ़क़ीर आज अहा हा!।
बुलबुल की निकलती है सफ़ीर आज अहा हा!।
कहता यही फिरता है ”नज़ीर“ आज अहा हा!।
सबकी तो बसन्तें हैं पै यारों का बसन्ता॥
— Nazeer Akbarabadi















