हरे पत्तों ने समझा है जड़ों का दुख
वगरना कौन समझे हम बड़ों का दुख
महल की ज़द पे पैसा रक़्स करता है
ग़रीबी ने चखा बस झोपड़ों का दुख
नए कमरे की सीलन से खुला मुझपर
घुटन की चाक पर बैठे घड़ों का दुख
के बेवा के लिए ज़ंजीर ज़ेवर है
सुहागन ही बताएगी कड़ों का दुख
जिन्होंने मौत देखी मर चुके समझो
नहीं आया सुख़न तक आँकड़ों का दुख
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