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हरे पत्तों ने समझा है जड़ों का दुख - Neeraj Neer

हरे पत्तों ने समझा है जड़ों का दुख
वगरना कौन समझे हम बड़ों का दुख

महल की ज़द पे पैसा रक़्स करता है
ग़रीबी ने चखा बस झोपड़ों का दुख

नए कमरे की सीलन से खुला मुझपर
घुटन की चाक पर बैठे घड़ों का दुख

के बेवा के लिए ज़ंजीर ज़ेवर है
सुहागन ही बताएगी कड़ों का दुख

जिन्होंने मौत देखी मर चुके समझो
नहीं आया सुख़न तक आँकड़ों का दुख

Neeraj Neer
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