ज़मीं दी है तो थोड़ा सा आसमाँ भी दे

मिरे ख़ुदा मिरे होने का कुछ गुमाँ भी दे

बना के बुत मुझे बीनाई का अज़ाब न दे
ये ही अज़ाब है क़िस्मत तो फिर ज़बाँ भी दे

ये काएनात का फैलाव तो बहुत कम है
जहाँ समा सके तन्हाई वो मकाँ भी दे

मैं अपने आप से कब तक किया करूँ बातें
मिरी ज़बाँ को भी कोई तर्जुमाँ भी दे

फ़लक को चाँद-सितारे नवाज़ने वाले
मुझे चराग़ जलाने को साएबाँ भी दे

— Nida Fazli

More by Nida Fazli

Other ghazal from the same pen

See all from Nida Fazli →

Falak Shayari

Shers of falak.

All Falak Shayari poetry →

Similar writers

Voices in the same orbit

Browse by mood

Poetry by feeling