ain mumkin hai mirii baat zaraa si nikle | ऐन मुमकिन है मिरी बात ज़रा सी निकले

  - Nilofar Noor

ऐन मुमकिन है मिरी बात ज़रा सी निकले
कोई तस्वीर मिरे दिल से तुम्हारी निकले

आज आँगन में तिरे हिज्र का सूरज निकला
आज मुमकिन है मिरे ज़ख़्म से किरची निकले

उस ने इस शर्त पे रोने की इजाज़त दी है
आह निकले न लबों से कोई सिसकी निकले

जाँ-कनी वो कि फ़रिश्ते भी पनाहें माँगे
आप आएँ तो मिरी आख़िरी हिचकी निकले

ऐसे निकला है मिरे बख़्त का तारा देखो
हाथ से टूट के बेवा के ज्यूँँ चूड़ी निकले

कोई आए मिरे जीने का सहारा बन कर
शाख़ से फूट के कोंपल कोई ऐसी निकले

आज फिर दिल में तिरे दीद की हसरत जागी
काश फिर काम कोई तुझ से ज़रूरी निकले

  - Nilofar Noor

Judai Shayari

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