ग़ज़ल लिखनी है या फिर ख़्वाब लिखना है
कहो किस को यहाँ महताब लिखना है
किया था ज़िक्र तेरी नजरों का लेकिन
तिरे बोसे को अब नायाब लिखना है
नहीं लिखना मुझे तेरी ख़ुशी को अब
मिरे ग़म को मुझे सैलाब लिखना है
मुहब्बत को समुंदर था लिखा लेकिन
तिरी निय्यत को अब तालाब लिखना है
नहीं मालूम लेकिन कह रहे हैं सब
मुझे 'पीयूष' को अहबाब लिखना है
— Piyush Nishchal















